रोटी कपड़ा और मकान-26-Sep-2025
रोटी कपड़ा और मकान
एक वक्त ऐसा था जब। कुछ चुनिंदा लोगों को छोड़कर अन्य किसी के पास कुछ भी नहीं था।लोग रोटी कपड़ा और मकान की तलाश में दर -दर भटकते नगर -महानगरों में धक्का खाते इधर से उधर मारे - मारे फिरा करते थे। फिर भी उन्हें दो वक्त का रोटी भी ढंग से नहीं मिल पाता था।वे कई -कई दिन और रातें भूखे पेट बस पानी पी कर अपना गुजारा करते थे। कभी -कभी तो ऐसा होता कि लोगों को पीने तक को पानी नसीब नहीं होता था। तन पर कपड़े के नाम पर पुरुषों के फटी -पुरानी मटमैला रंग की कमीज़ और धोती तथा महिलाओं के तन पर एक फटी पुरानी सुती
साड़ी के सिवाय कुछ नहीं होता था।माघ -पुस की कंपकपाती ठंड में भी लोग एक फटी चादर में रात गुजार लेते थे। उनके पास सिर छुपाने तक को भी छत नहीं थी।लोग मजबूर थे घने पेड़ों और टुट्टी हुई पुल में रहने को। समय गुजरता गया और वक्त ने एक जोर दार करवट ले ली है। अब सबके पास अपार धन-संपत्ति है। घर में हर प्रकार की सुख -सुविधा उपलब्ध है तरह -तरह के खाद्य -पदार्थ भरें पड़े हैं किन्तु अब भूख कहीं खो गया है! दूर -दूर तक भूख का कोई पता नहीं है। ऐसी स्थिति हो गई है कि अब लोगों के पास खाने के लिए वक्त नहीं है। कोई चीनी खाकर शुगर का मरीज हो गया तो कोई अधिक खा कर मोटापे का शिकार हो गया। पहले लोग खाने की तलाश में दर -दर भटक रहे थे ।अब लोग खाना पचाने के लिए सुबह-शाम सड़कों पर भटक नहीं टहलने लगे हैं। पहले लोग गरीबी और बदहाली में जुझते हुए फटे कपड़े पहने को मजबूर थे। लेकिन अब फटे कपड़े पहनना लोगों का फैशन हो गया है अब तो दुकानों में भी फटी हुई कपड़े बिकने लगी है। एक दौर ऐसा था जब सिर छुपाने के लिए सोचना पड़ता था। अब सबके पास पीएम आवास है। पूंजी पतियों के पास बड़ी -बड़ी दस- बीस मंज़िला इमारतें खड़ी है।लोग घर बना कर किराये में देने लगें हैं। अब सब का सोचने का तरीका बदल गया लोग रोटी के पीछे नहीं महंगी - महंगी गाड़ियों और आई-फोन के पीछे- पीछे भागने लगे हैं।
एक वक्त ऐसा था जब। कुछ चुनिंदा लोगों को छोड़कर अन्य किसी के पास कुछ भी नहीं था।लोग रोटी कपड़ा और मकान की तलाश में दर -दर भटकते नगर -महानगरों में धक्का खाते इधर से उधर मारे - मारे फिरा करते थे। फिर भी उन्हें दो वक्त का रोटी भी ढंग से नहीं मिल पाता था।वे कई -कई दिन और रातें भूखे पेट बस पानी पी कर अपना गुजारा करते थे। कभी -कभी तो ऐसा होता कि लोगों को पीने तक को पानी नसीब नहीं होता था। तन पर कपड़े के नाम पर पुरुषों के फटी -पुरानी मटमैला रंग की कमीज़ और धोती तथा महिलाओं के तन पर एक फटी पुरानी सुती
साड़ी के सिवाय कुछ नहीं होता था।माघ -पुस की कंपकपाती ठंड में भी लोग एक फटी चादर में रात गुजार लेते थे। उनके पास सिर छुपाने तक को भी छत नहीं थी।लोग मजबूर थे घने पेड़ों और टुट्टी हुई पुल में रहने को। समय गुजरता गया और वक्त ने एक जोर दार करवट ले ली है। अब सबके पास अपार धन-संपत्ति है। घर में हर प्रकार की सुख -सुविधा उपलब्ध है तरह -तरह के खाद्य -पदार्थ भरें पड़े हैं किन्तु अब भूख कहीं खो गया है! दूर -दूर तक भूख का कोई पता नहीं है। ऐसी स्थिति हो गई है कि अब लोगों के पास खाने के लिए वक्त नहीं है। कोई चीनी खाकर शुगर का मरीज हो गया तो कोई अधिक खा कर मोटापे का शिकार हो गया। पहले लोग खाने की तलाश में दर -दर भटक रहे थे ।अब लोग खाना पचाने के लिए सुबह-शाम सड़कों पर भटक नहीं टहलने लगे हैं। पहले लोग गरीबी और बदहाली में जुझते हुए फटे कपड़े पहने को मजबूर थे। लेकिन अब फटे कपड़े पहनना लोगों का फैशन हो गया है अब तो दुकानों में भी फटी हुई कपड़े बिकने लगी है। एक दौर ऐसा था जब सिर छुपाने के लिए सोचना पड़ता था। अब सबके पास पीएम आवास है। पूंजी पतियों के पास बड़ी -बड़ी दस- बीस मंज़िला इमारतें खड़ी है।लोग घर बना कर किराये में देने लगें हैं। अब सब क सोचने का तरीका बदल गया लोग रोटी के पीछे नहीं महंगी - महंगी गाड़ियों और आई-फोन के पीछे- पीछे भागने लगे हैं।